स्वतंत्रता

    मनुष्य के चतुर्दिक विकास के लिए उसका स्वतंत्र होना आवश्यक है। स्वतंत्र न होने पर मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक और चेतना से कार्य सफल नहीं कर पाता है। पराधीनता की जंजीरें मानवीय जीवन को पशुतर कर देती है। कहा भी गया है कि – पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। अर्थात जो व्यक्ति किसी भी स्तरContinue reading “स्वतंत्रता”

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