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स्वतंत्रता

    मनुष्य के चतुर्दिक विकास के लिए उसका स्वतंत्र होना आवश्यक है। स्वतंत्र न होने पर मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक और चेतना से कार्य सफल नहीं कर पाता है। पराधीनता की जंजीरें मानवीय जीवन को पशुतर कर देती है। कहा भी गया है कि – पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। अर्थात जो व्यक्ति किसी भी स्तर पर, किसी भी रूप में पराधीन होता है, वह कभी सपने में भी सुख नहीं पा सकता। आरजी इंगरसोल ने कहा कि आंखों के लिए जैसे प्रकाश है, फेफड़ों के लिए जैसे वायु है और हृदय के लिए जैसा कि प्यार है उसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के लिए स्वतंत्रता है।

स्वतंत्रता स्वाधीनता शब्द का पर्याय है। जिसका अर्थ है किसी और के लिए नहीं बल्कि स्वयं की अधीनता।अगर मनुष्य स्वयं के लिए अधीन नहीं होगा तो समाज के हिंसक और अराजक हो सकता है। स्वतंत्र यानि एक स्व निर्मित तंत्र जो हमारे पुर्वजो के विचारों नियमों और परंपरा की बुनियाद पर टिका होता है। स्वतंत्रता के संबंध में दो प्रकार के विचार देखने को मिलता है- निषेधात्मक और भावात्मक! निषेधात्मक का अर्थ है-किसी भी तरह के बंधनों का अभाव लेकिन इसका तात्पर्य उच्छृंखलता नहीं, बल्कि मर्यादित सीमा के अंदर व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। भावात्मक का अर्थ है – मानव के स्वर्णिम विकास एवं व्यक्तित्व के लिए सुविधाओं और अवसरों की उपलब्धता। अतः स्वतंत्रता एक समान्वयात्मक धारणा है जिसमें निषेधात्मक और भावात्मक दोनों पक्ष शामिल हैं। जो निरपेक्ष नहीं सापेक्ष है। जिसमें बंधनों का अभाव वही तक सीमित है जहॉं तक दुसरों के अधिकारों का हनन न हो। रूजवेल्ट कहते हैं कि व्यक्ति को विचारों की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, अभावों से स्वतंत्रता और भय से स्वतंत्रता, ये चारो मिलनी चाहिए।

समाज और स्वतंत्रता का भी संबंध साहचर्य है। एक संगठित सभ्य समाज के निवासी एवं सामाजिक प्राणी होने के नाते हमें कुछ सीमाओं का पालन करना आवश्यक है। स्वतंत्रता के इन्हीं नियमों एवं सीमाओं से समाज में समानता का भाव निर्मित होता है। ये हमारी स्वच्छन्दता और शक्तियों के अविवेकपूर्ण उपयोग को रोकती है। स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण शर्त है आंतरिक चाह। यदि आंतरिक चाह न हो तो स्वतंत्रता बची नहीं रह सकती।

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